Lohri 2026: अलाव के साथ ठंड को विदा, परंपरा और खुशहाली का उत्सव क्यों है खास

उत्तर भारत में आज Lohri 2026 पूरे उत्साह के साथ मनाई जा रही है। पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली-एनसीआर और जम्मू-कश्मीर में शाम होते ही घरों के आंगन और खुले मैदानों में अलाव जल उठे। Lohri 2026 को ठंड के अंतिम दिनों की विदाई और लंबे, उजले दिनों के स्वागत का पर्व माना जाता है। परिवार और पड़ोसी एक साथ जुटते हैं, लोकगीत गाते हैं और अग्नि की परिक्रमा करते हैं।

प्रदोष काल से शुरू हुआ Lohri 2026 का उत्सव

Lohri 2026 का मुख्य उत्सव आज शाम प्रदोष काल से शुरू हुआ। लोग अलाव में तिल, गुड़, मूंगफली, रेवड़ी और मक्के की बालियां अर्पित कर रहे हैं। मान्यता है कि Lohri 2026 सूर्य देव की उत्तरायण यात्रा का प्रतीक है, जो नई शुरुआत और समृद्धि का संकेत देती है।

Lohri और मकर संक्रांति का संबंध

विकिपीडिया के अनुसार, Lohri 2026 मकर संक्रांति की पूर्व संध्या पर मनाई जाती है। इस वर्ष संक्रांति 14 जनवरी को दोपहर 3:13 बजे होगी, लेकिन पारंपरिक रूप से Lohri 2026 का उत्सव 13 जनवरी की शाम से ही आरंभ हो गया। यही कारण है कि उत्तर भारत के कई शहरों में देर रात तक ढोल और गीतों की गूंज सुनाई दे रही है।

बिहार और पटना में Lohri 2026

बिहार के शहर पटना में Lohri 2026 सीमित स्तर पर मनाई जा रही है। यहां पंजाबी समुदाय अपने रीति-रिवाजों के साथ पर्व मना रहा है। सोशल मीडिया पर Lohri 2026 से जुड़ी तस्वीरें और शुभकामनाएं तेजी से साझा हो रही हैं, जिससे पूरे देश में उत्सव का माहौल बना हुआ है।

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Lohri का ऐतिहासिक और कृषि महत्व

Lohri 2026 की जड़ें प्राचीन हिमालयी क्षेत्रों से जुड़ी मानी जाती हैं। यह रबी फसलों जैसे गेहूं, सरसों और गन्ने की कटाई का संकेत भी है। विज्ञान दिवाइन ब्लॉग के मुताबिक, Lohri सूर्य देव को धन्यवाद देने का अवसर है, क्योंकि सूर्य की ऊर्जा से ही फसलें लहलहाती हैं और जीवन चलता है।

नवविवाहित और नवजात के लिए Lohri

टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, Lohri 2026 नवविवाहित जोड़ों और नवजात शिशुओं के लिए विशेष महत्व रखती है। जिन घरों में हाल ही में शादी या बच्चे का जन्म हुआ हो, वहां यह पर्व खास तरीके से मनाया जाता है और परिवार की खुशहाली के लिए प्रार्थनाएं की जाती हैं।

धार्मिक मान्यताएं और Lohri 

धार्मिक रूप से Lohri 2026 अग्नि देव और सूर्य देव की आराधना का पर्व है। न्यूज़18 हिंदी के अनुसार, अलाव में अर्पण करने की परंपरा नकारात्मक ऊर्जा को समाप्त कर सकारात्मकता लाने का प्रतीक है। किसानों के लिए Lohri अच्छी फसल की कामना का दिन है, जबकि शहरों में यह सामाजिक एकता का संदेश देता है।

दुल्ला भट्टी और Lohri की लोककथा

Lohri से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा दुल्ला भट्टी की है। मुगल काल में दुल्ला भट्टी ने कई युवतियों को गुलामी से बचाया और उनकी शादी करवाई। आज भी Lohri के मौके पर बच्चे “सुंदर मुंदरिए हो” गाते हुए घर-घर जाते हैं और लोहड़ी सामग्री इकट्ठा करते हैं।

Lohri की पूजन विधि और मुहूर्त

Lohri का पूजन सरल है। आज प्रदोष काल, यानी शाम 5:34 से 8:12 बजे तक, लकड़ियों का ढेर तैयार कर उस पर गंगाजल छिड़का जाता है। इसके बाद अग्नि प्रज्वलित कर तिल, गुड़, गजक, मूंगफली और पॉपकॉर्न अर्पित किए जाते हैं और सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।

नृत्य, गीत और सांस्कृतिक रंग

Lohri की शाम भंगड़ा, गिद्दा और ढोल की थाप से गूंज रही है। गुरुद्वारों में अरदास हो रही है और दिल्ली, चंडीगढ़ व जालंधर जैसे शहरों में बड़े सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं।

Lohri के पारंपरिक व्यंजन

Lohri पर सरसों दा साग, मक्की दी रोटी, तिल के लड्डू, गजक और रेवड़ी प्रमुख रूप से बनाई जाती हैं। ये व्यंजन सर्दी में शरीर को ऊर्जा देने वाले माने जाते हैं।

आधुनिक दौर में Lohri 

आज Lohri सोशल मीडिया पर भी छाई हुई है। #HappyLohri2026 ट्रेंड कर रहा है और पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए इको-फ्रेंडली अलाव की पहल भी दिख रही है।

निष्कर्ष

Lohri सिर्फ एक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, परंपरा और परिवार से जुड़ने का अवसर है। ठंड को विदा कर गर्मी का स्वागत करने वाला यह त्योहार उम्मीद और सामूहिकता का संदेश देता है। Lohri 2026 के मौके पर सभी के लिए सुख और समृद्धि की कामना की जा रही है।

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