Iran attack on Arab countries के बाद भी चुप क्यों हैं खाड़ी देश? Ummah, डर या रणनीति—क्या है असली वजह

Iran attack on Arab countries के बाद पूरे मिडिल ईस्ट में तनाव अपने चरम पर है। मिसाइलें गिरीं, ड्रोन हमले हुए, तेल रिफाइनरी जलीं, लेकिन इसके बावजूद खाड़ी देशों ने अब तक ईरान पर सीधा सैन्य जवाब नहीं दिया है। सवाल यही है—जब Iran attack on Arab countries खुलकर हुआ, तो फिर जवाबी कार्रवाई क्यों नहीं?

पिछले तीन दशकों में Bahrain, Qatar, Kuwait, Oman, UAE और Saudi Arabia ने खुद को एक स्थिर और कारोबारी तौर पर सुरक्षित क्षेत्र के रूप में पेश किया था। लेकिन हाल की घटनाओं ने उस छवि को झटका दिया है। ईरान की मिसाइलें सिर्फ अमेरिकी सैन्य ठिकानों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि दुबई और अबू धाबी के रिहायशी इलाकों और होटलों तक पहुंचीं। इसके बावजूद Iran attack on Arab countries के बाद संयम देखने को मिल रहा है।

Khamenei की हत्या के बाद बदला समीकरण

Iran attack on Arab countries उस वक्त शुरू हुआ जब अमेरिका और इज़राइल के संयुक्त हवाई हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर Ayatollah Ali Khamenei मारे गए। Khamenei सिर्फ ईरान के राजनीतिक प्रमुख नहीं थे, बल्कि शिया मुस्लिमों के बड़े धार्मिक नेता भी माने जाते थे।

ऐसे में Iran attack on Arab countries को सिर्फ एक सैन्य जवाब नहीं, बल्कि धार्मिक और भावनात्मक प्रतिक्रिया के तौर पर भी देखा जा रहा है। खाड़ी देशों के सामने दुविधा यह है कि अगर वे जवाबी हमला करते हैं, तो क्या उन्हें मुस्लिम उम्माह के खिलाफ खड़ा माना जाएगा? और क्या यह कदम उन्हें अमेरिका-इज़राइल के साथ खड़ा दिखाएगा?

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Muslim Ummah का सवाल

Iran attack on Arab countries के बाद Muslim Ummah की चर्चा तेज हो गई है। Ummah का मतलब है दुनियाभर के मुसलमानों का साझा समुदाय। इतिहास में जब भी बाहरी खतरा रहा है, Ummah की भावना को एकजुटता के लिए इस्तेमाल किया गया है।

हालांकि शिया-सुन्नी मतभेद लंबे समय से मौजूद हैं। ज्यादातर अरब देश सुन्नी बहुल हैं, जबकि ईरान शिया देश है। इसके बावजूद कई मौकों पर यह मतभेद पीछे छूटते दिखे हैं।

1989 में जब Ayatollah Ruhollah Khomeini का निधन हुआ था, तब इराक के राष्ट्रपति Saddam Hussein, जो सुन्नी थे, ने आधिकारिक शोक जताया था, जबकि हाल ही में ईरान-इराक युद्ध खत्म हुआ था। Syria और Lebanon ने भी शोक दिवस घोषित किए थे।

1979 की ईरानी क्रांति के दौरान भी कुछ सुन्नी समूहों ने Khomeini का समर्थन किया था, क्योंकि इसे पश्चिमी प्रभाव के खिलाफ कदम माना गया था।

Iran attack on Arab countries के बाद भी यही भावनात्मक पहलू कई विश्लेषकों के मुताबिक अहम भूमिका निभा रहा है।

Israel फैक्टर और साझा नाराजगी

पिछले कुछ दशकों में इज़राइल के खिलाफ साझा नाराजगी ने भी शिया और सुन्नी समूहों को कई बार एक मंच पर लाया है। Gaza को लेकर हुए विरोध प्रदर्शनों में यह देखा गया।

Abraham Accords इसका एक उदाहरण है। UAE और Bahrain ने इज़राइल के साथ संबंध सामान्य किए थे। Saudi Arabia भी इस दिशा में आगे बढ़ रहा था, लेकिन 7 अक्टूबर 2023 को Hamas के हमले और उसके बाद Gaza युद्ध के चलते यह प्रक्रिया रुक गई।

Iran attack on Arab countries के बाद अगर कोई खाड़ी देश सीधे ईरान पर हमला करता है, तो इसे मुस्लिम दुनिया में अमेरिका-इज़राइल के साथ खड़े होने के तौर पर देखा जा सकता है। यही धारणा उन्हें सावधान बना रही है।

खाड़ी देशों की आधिकारिक प्रतिक्रिया

Iran attack on Arab countries के बाद अमेरिका, Bahrain, Jordan, Kuwait, Qatar, Saudi Arabia और UAE ने संयुक्त बयान जारी कर ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों को “खतरनाक और गैर-जिम्मेदाराना” बताया। Gulf Cooperation Council (GCC) ने आपात बैठक बुलाकर इन हमलों की निंदा की और आत्मरक्षा का अधिकार सुरक्षित रखने की बात कही।

Saudi Arabia के विदेश मंत्रालय ने कड़े शब्दों में हमलों की निंदा की और जवाब देने का अधिकार सुरक्षित रखा। Qatar और UAE ने भी इसे संप्रभुता का उल्लंघन बताया।

लेकिन Iran attack on Arab countries के बावजूद अब तक किसी देश ने सैन्य जवाब नहीं दिया है।

अमेरिकी ठिकाने बने निशाना

Iran attack on Arab countries में जिन खाड़ी देशों को निशाना बनाया गया, वहां अमेरिकी सैन्य ठिकाने मौजूद हैं। उदाहरण के लिए, UAE में Al Dhafra Air Base है, जहां हजारों अमेरिकी सैनिक तैनात हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान ने UAE पर 165 से ज्यादा बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं।

Oman पर भी हमला हुआ, हालांकि वहां अमेरिकी बेस नहीं है। ईरान ने बाद में इसकी अलग से व्याख्या दी।

दिलचस्प बात यह है कि कई खाड़ी देशों ने अमेरिका-इज़राइल के हमलों के लिए अपने हवाई क्षेत्र के इस्तेमाल से इनकार किया था। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कूटनीति का समर्थन किया था।

Saudi Arabia की दुविधा

Saudi Arabia और ईरान के बीच लंबे समय से क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर खींचतान रही है, खासकर Yemen और Syria को लेकर। फिर भी Iran attack on Arab countries के बाद Saudi Arabia ने बहुत सतर्क रुख अपनाया है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, Crown Prince Mohammed bin Salman ने चेतावनी दी है कि अगर हमले जारी रहे तो जवाब दिया जा सकता है। लेकिन अब तक कोई सैन्य कार्रवाई नहीं हुई है, जबकि Aramco रिफाइनरी पर ड्रोन हमले के बाद आग लगने की तस्वीरें सामने आईं।

Washington Post की एक रिपोर्ट के मुताबिक, Khamenei की हत्या वाले दिन Saudi Crown Prince और Israeli PM Benjamin Netanyahu ने अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump से ईरान पर हमले की मांग की थी। हालांकि सार्वजनिक तौर पर Saudi Arabia ने कूटनीतिक समाधान की बात कही है।

डर और संभावित नतीजे

Iran attack on Arab countries के बाद एक बड़ा डर यह भी है कि अगर खाड़ी देश जवाबी हमला करते हैं, तो ईरान और ज्यादा आक्रामक हो सकता है। एक ईरानी सैन्य स्रोत के हवाले से कहा गया कि अगर किसी अरब देश ने हमला किया तो वहां के शाही महलों को निशाना बनाया जाएगा।

भले ही यह बयान आधिकारिक न हो, लेकिन संदेश साफ है—ईरान सीधी टक्कर से पीछे नहीं हटेगा।

धार्मिक भावना और जनमत

Khamenei की हत्या को कई जगह “शहादत” के रूप में पेश किया गया है। Qom स्थित Jamkaran Mosque पर लाल झंडा फहराया गया, जो शिया परंपरा में शहीदों के खून का प्रतीक है।

Iran attack on Arab countries के बीच अगर कोई सुन्नी बहुल देश ईरान पर हमला करता है, तो उसे मुस्लिम दुनिया के एक हिस्से में आलोचना का सामना करना पड़ सकता है। यही कारण है कि खाड़ी देश हर कदम फूंक-फूंककर रख रहे हैं।

फिलहाल संयम ही रणनीति?

Iran attack on Arab countries के बाद अब तक जो तस्वीर सामने आई है, वह यह दिखाती है कि खाड़ी देश सैन्य टकराव से बचना चाहते हैं। वे अमेरिका के साथ सुरक्षा संबंध बनाए रखना चाहते हैं, लेकिन सीधे ईरान से युद्ध में भी नहीं कूदना चाहते।

तेल आपूर्ति, Strait of Hormuz की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता उनके लिए बेहद अहम है। खुला युद्ध इन सब पर असर डाल सकता है।

इसलिए Iran attack on Arab countries के बावजूद जवाबी हमले से दूरी बनाए रखना शायद रणनीतिक फैसला है—जहां धार्मिक भावना, जनमत, सुरक्षा चिंता और आर्थिक हित, सब एक साथ जुड़े हुए हैं।

आने वाले दिनों में स्थिति किस दिशा में जाती है, यह कहना मुश्किल है। लेकिन फिलहाल इतना साफ है कि Iran attack on Arab countries के बाद भी खाड़ी देश सीधे युद्ध से बचना चाहते हैं।

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