China को काउंटर करने की तैयारी, Critical Minerals Summit में भारत शामिल, पाकिस्तान साइडलाइन

अमेरिका में चल रहे विदेश मंत्री एस. जयशंकर के तीन दिवसीय दौरे ने वैश्विक राजनीति में एक अहम संदेश दिया है। 4 फरवरी 2026 को वॉशिंगटन में आयोजित Critical Minerals Summit में भारत की मौजूदगी और पाकिस्तान की गैरहाजिरी को लेकर चर्चा तेज हो गई है। यह समिट अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की मेजबानी में हुई, जिसका मकसद चीन के दबदबे वाले क्रिटिकल मिनरल सप्लाई चेन से दुनिया को बाहर निकालना है। ऐसे समय में, जब पाकिस्तान हाल के महीनों में व्हाइट हाउस के आसपास सक्रिय दिख रहा था, उसका इस मंच से बाहर रहना कई सवाल खड़े करता है।

जयशंकर का अमेरिका दौरा और Critical Minerals Summit

विदेश मंत्री जयशंकर का यह दौरा ऐसे वक्त पर हुआ है, जब भारत-अमेरिका संबंधों को लेकर तरह-तरह की अटकलें लगाई जा रही थीं। कुछ लोगों का मानना था कि टैरिफ, टेक्नोलॉजी और वीज़ा जैसे मुद्दों पर दोनों देशों के बीच दूरी बढ़ रही है। लेकिन Critical Minerals Summit में भारत की भागीदारी ने यह साफ कर दिया कि रणनीतिक स्तर पर दोनों देश एक-दूसरे के और करीब आ रहे हैं।

इस समिट में जी-7 देशों के साथ भारत, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, मैक्सिको, अर्जेंटीना, न्यूजीलैंड और अफ्रीका के कई खनिज-संपन्न देश शामिल हुए। चीन को जानबूझकर इस मंच से बाहर रखा गया।

Major Gaurav Arya का वायरल वीडियो

इस पूरी घटना पर सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा चर्चा एक वायरल हिंदी वीडियो की हो रही है, जो “The Chanakya Dialogues” प्लेटफॉर्म पर 3 फरवरी 2026 को अपलोड किया गया। रिटायर्ड मेजर गौरव आर्य ने करीब 12 मिनट के इस वीडियो में Critical Minerals Summit के मायने आम भाषा में समझाने की कोशिश की।

उन्होंने बताया कि आज की दुनिया में मोबाइल फोन, टीवी, इलेक्ट्रिक गाड़ियां, सेमीकंडक्टर और मिसाइल सिस्टम तक क्रिटिकल मिनरल्स पर निर्भर हैं। अगर इनकी सप्लाई रुक जाए, तो आधुनिक जीवन ठहर सकता है।

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चीन का दबदबा और पश्चिम की चिंता

मेजर आर्य के मुताबिक, चीन के पास दुनिया के 60 फीसदी से ज्यादा क्रिटिकल मिनरल भंडार और करीब 90 फीसदी प्रोसेसिंग क्षमता है। यही वजह है कि अमेरिका और उसके सहयोगी देश लंबे समय से सप्लाई चेन को लेकर चिंतित हैं।

कोविड के बाद और अमेरिका-चीन ट्रेड वॉर के दौरान यह डर और गहरा हो गया। इसी पृष्ठभूमि में Critical Minerals Summit जैसे मंच की जरूरत महसूस की गई, जहां देश मिलकर विकल्प तलाश सकें।

पाकिस्तान क्यों रहा बाहर

मेजर आर्य ने हाल ही में वायरल हुई उस तस्वीर का जिक्र किया, जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख असीम मुनीर नजर आए थे।

उस बैठक में पाकिस्तान की ओर से “रेयर अर्थ मिनरल्स” का जिक्र किया गया था और पासनी पोर्ट तक पहुंच की पेशकश भी सामने आई थी। लेकिन Critical Minerals Summit में पाकिस्तान को न्योता नहीं मिलना यह दिखाता है कि वैश्विक मंच पर उसके दावों को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा।

अफ्रीका और खरीदारों का नया मंच

मेजर आर्य के अनुसार, यह समिट असल में खरीदार और विक्रेता देशों का एक क्लब है। जी-7 और भारत जैसे देश खरीदार हैं, जबकि अफ्रीका के कांगो, गिनी और केन्या जैसे देश खनिज आपूर्ति की बड़ी संभावनाएं रखते हैं।

इस पूरे ढांचे में पाकिस्तान न तो बड़ा खरीदार है और न ही भरोसेमंद आपूर्तिकर्ता। यही वजह है कि Critical Minerals Summit में उसकी कोई जगह नहीं बनी।

भारत के लिए क्या मायने

भारत के लिए यह समिट कई मायनों में अहम है। आंध्र प्रदेश में लिथियम के शुरुआती संकेत, घरेलू नीलामी प्रक्रिया और 2024 में शुरू हुई इंडिया क्रिटिकल मिनरल्स मिशन के जरिए भारत खुद को इस सेक्टर में मजबूत करना चाहता है।

जयशंकर की मौजूदगी यह बताती है कि भारत सिर्फ उपभोक्ता नहीं, बल्कि प्रोसेसिंग और रिफाइनिंग हब बनने की दिशा में भी काम कर रहा है। Critical Minerals Summit में भागीदारी से भारत को अफ्रीकी देशों के साथ नए समझौते करने का मौका मिल सकता है।

आने वाले वैश्विक मंच

आने वाले महीनों में मुंबई, जकार्ता, ब्रिस्बेन, वैंकूवर और टोक्यो में क्रिटिकल मिनरल्स से जुड़े बड़े सम्मेलन होने वाले हैं। इनमें से किसी भी मंच पर पाकिस्तान की मौजूदगी की संभावना नहीं दिखती।

मुंबई में 10-11 फरवरी को होने वाला सम्मेलन भारत के लिए खास माना जा रहा है, क्योंकि जयशंकर की अमेरिका यात्रा के बाद वहां कई विदेशी प्रतिनिधिमंडल पहुंच सकते हैं।

ट्रंप की पोस्ट और भारत-अमेरिका रिश्ते

मेजर आर्य ने राष्ट्रपति ट्रंप की एक सोशल मीडिया पोस्ट का भी जिक्र किया, जिसमें भारत की ओर से निवेश और संभावित टैरिफ राहत की बात कही गई थी। इससे यह संकेत मिलता है कि Critical Minerals Summit के साथ-साथ व्यापारिक मोर्चे पर भी बातचीत आगे बढ़ रही है।

भारत का लक्ष्य 2030 तक इलेक्ट्रिक व्हीकल सेक्टर में 30 फीसदी हिस्सेदारी हासिल करना है, और इसके लिए लिथियम, कोबाल्ट जैसे खनिज बेहद जरूरी हैं।

पाकिस्तान की मुश्किलें

पाकिस्तान लंबे समय से अपने खनिज संसाधनों को लेकर बड़े दावे करता रहा है, लेकिन जमीनी हालात अलग तस्वीर दिखाते हैं। बलूचिस्तान में अस्थिरता, पासनी जैसे इलाकों में हालिया हमले और आर्थिक संकट निवेशकों का भरोसा कमजोर करते हैं।

मेजर आर्य का तर्क है कि अगर वहां सच में बड़े खनिज भंडार होते, तो चीन जैसे करीबी साझेदार ने अब तक उन्हें निकाल लिया होता। Critical Minerals Summit से पाकिस्तान का बाहर रहना इसी हकीकत की ओर इशारा करता है।

भारत की रणनीतिक बढ़त

भारत के लिए यह स्थिति रणनीतिक बढ़त लेकर आई है। क्वाड और I2U2 जैसे मंचों के जरिए पहले ही खनिज सहयोग पर काम हो रहा था, अब Critical Minerals Summit ने इसे और मजबूती दी है।

यह सिर्फ अर्थव्यवस्था का सवाल नहीं, बल्कि रक्षा और टेक्नोलॉजी से भी जुड़ा है। स्वदेशी लड़ाकू विमान, मिसाइल सिस्टम और ग्रीन एनर्जी प्रोजेक्ट्स के लिए स्थिर सप्लाई जरूरी है।

एक बदलती वैश्विक तस्वीर

इस समिट को कई जानकार एक नए वैश्विक ब्लॉक की शुरुआत मान रहे हैं, जहां लोकतांत्रिक और संसाधन-संपन्न देश मिलकर सप्लाई चेन को सुरक्षित करेंगे। भारत इसमें एक सेतु की भूमिका निभा सकता है।

जैसे-जैसे जयशंकर की अमेरिका यात्रा आगे बढ़ रही है, यह साफ होता जा रहा है कि Critical Minerals Summit सिर्फ एक बैठक नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों की रणनीति का संकेत है।

कुल मिलाकर, इस समिट ने यह संदेश दे दिया है कि बदलती वैश्विक राजनीति में भारत की भूमिका बढ़ रही है, जबकि पाकिस्तान हाशिये पर जाता दिख रहा है। आने वाले महीनों में होने वाले सम्मेलन तय करेंगे कि यह रणनीतिक बदलाव कितना गहरा साबित होता है।

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