छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में सुरक्षा बलों ने 17 नवंबर 2025 को एक ऐसा ऑपरेशन चलाया जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। यह ऑपरेशन केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं था, बल्कि नक्सलवाद के सबसे बड़े चेहरों में से एक के अंत की कहानी भी था। यह वही क्षण था जब खबर आई कि कुख्यात नक्सली कमांडर माड़वी हिडमा मारा गया। इस Hidma encounter ने सुरक्षा एजेंसियों को एक बड़ी रणनीतिक जीत दिलाई और देशभर में चर्चा छेड़ दी कि क्या अब नक्सलवाद अपने आखिरी दौर में है।
बस्तर के जंगल में गुप्त मिशन
जानकारी के अनुसार सुरक्षा बल कई दिनों से इस पूरे इलाके की रेकी कर रहे थे। जंगल की भौगोलिक स्थिति बेहद कठिन थी और हर कदम सोच-समझकर रखना पड़ रहा था। ऑपरेशन को इतना गुप्त रखा गया कि आसपास के गांवों में भी इसकी भनक नहीं लगी। सुबह होते-होते सुरक्षा बलों ने सुमा जिले के एक गांव के पास घेराबंदी कर ली। यहीं पर वह मुठभेड़ शुरू हुई जिसे अब देश Hidma encounter के नाम से जान रहा है।
Hidma encounter में क्या हुआ?
जंगल के बीच हुई इस मुठभेड़ में हिडमा, उसकी पत्नी और उसके करीब के कई साथी मारे गए। सुरक्षा बलों के लिए यह सिर्फ एक ऑपरेशन नहीं था, बल्कि लंबे समय से जारी एक संघर्ष का निर्णायक पड़ाव था। Hidma encounter इसलिए भी खास था क्योंकि यह वही नक्सली था जिसने वर्षों तक सुरक्षा बलों को चुनौती दी और कई बड़े हमलों की साजिश रची।
ताड़मेटला का दर्द, जिसने देश को झकझोरा
जब Hidma encounter की खबर फैली, तो कई लोगों को 2010 के उस ताड़मेटला हमले की याद आ गई जिसने पूरे देश को हिला दिया था। नक्सलियों ने उस समय 76 सीआरपीएफ जवानों को शहीद कर दिया था। बाद में जांच में सामने आया कि इस हमले का मास्टरमाइंड वही माड़वी हिडमा था। यही वह घटना थी जिसने उसे नक्सल संगठन में एक बड़े नाम के रूप में स्थापित कर दिया।
झीरम घाटी की वारदात भी जुड़ी हिडमा से
2013 की झीरम घाटी में कांग्रेस नेताओं पर हुए हमले में भी हिडमा का नाम सामने आया था। इस हमले में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष, वरिष्ठ नेता और सुरक्षा बलों के जवान मारे गए थे। इन घटनाओं ने हिडमा को नक्सल आंदोलन का सबसे खतरनाक चेहरा बना दिया। यही वजह है कि Hidma encounter को नक्सलवाद के खिलाफ सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिना जा रहा है।
हिडमा की रणनीति और उसका नेटवर्क
हिडमा के पास जंगल की समझ, गोरिल्ला युद्ध की तकनीक और अपने दस्तों को तैयार करने का तरीका उसे नक्सलियों के बीच एक प्रमुख नेता बनाता था। उसने PSA बटालियन नंबर वन बनाई, जिसमें आदिवासी युवाओं को शामिल किया गया। यह दस्ते गुप्तचर, गोरिल्ला तकनीक और इलाके के नियंत्रण में माहिर थे। कई बार सुरक्षा बलों को भी यह अंदाजा नहीं होता था कि हिडमा और उसके दस्ते किस दिशा से हमला कर देंगे। इसलिए Hidma encounter को नक्सल नेटवर्क के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।
हिडमा की पृष्ठभूमि समझना जरूरी
हिडमा का जन्म एक सामान्य आदिवासी परिवार में हुआ था। उनके गांव में गरीबी, विकास की कमी, स्वास्थ्य सुविधाओं की अनुपलब्धता और सरकारी भ्रष्टाचार जैसी समस्याएं थीं। इन परिस्थितियों ने उसे नक्सल आंदोलन की ओर धकेला। कई नक्सल प्रभावित इलाकों में आदिवासियों के सामने यही विकल्प रह जाता है कि वे या तो सरकार पर भरोसा करें या नक्सल संगठनों की ओर मुड़ें।
सरकार की तीन-स्तरीय रणनीति
सरकार ने नक्सलवाद से निपटने के लिए सुरक्षा, विकास और संचार—इन तीन स्तरों पर काम किया। सुरक्षा मोर्चे पर ऑपरेशन कॉक जैसे अभियान चलाए गए। विकास में सड़क, बिजली, स्वास्थ्य केंद्र और शिक्षा परियोजनाएं शुरू की गईं। संचार के स्तर पर हथियार छोड़ने वाले नक्सलियों के पुनर्वास और कौशल विकास कार्यक्रम लाए गए। Hidma encounter ने दिखा दिया कि यह रणनीति अब असर दिखा रही है।
2026 तक नक्सलवाद खत्म करने का लक्ष्य
सरकार ने 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद समाप्त करने का लक्ष्य तय किया है। Hidma encounter इस दिशा में एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है, क्योंकि हिडमा जैसा नेतृत्वकर्ता नक्सल संगठन की रीढ़ था।
नक्सलवाद केवल बंदूक की कहानी नहीं
Hidma encounter भले ही सुरक्षा बलों की विजय का प्रतीक है, लेकिन नक्सलवाद की जड़ें सामाजिक और आर्थिक असमानता में भी छिपी हैं। जब तक आदिवासी क्षेत्रों में विकास नहीं पहुंचेगा, यह समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होगी।
कानून का रास्ता ही समाधान
हिडमा का अंत यह याद दिलाता है कि हिंसा का रास्ता कभी नहीं जीतता। Hidma encounter इसी बात का उदाहरण है कि जो संस्था हथियारों के भरोसे चलती है, उसका अंत भी हथियारों से ही होता है।