US invade Greenland: ट्रंप ने ग्रीनलैंड पर हमले का प्लान बनाने को कहा, अमेरिका के ‘गंभीर’ इरादों से NATO में हलचल

US invade Greenland को लेकर आई रिपोर्ट्स ने दुनिया की राजनीति में हलचल मचा दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कथित तौर पर सेना के शीर्ष अधिकारियों और स्पेशल फोर्सेस कमांडर्स को ग्रीनलैंड पर संभावित आक्रमण का प्लान तैयार करने का निर्देश दिया है। यह दावा ब्रिटिश अखबार द मेल की एक रिपोर्ट में किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन इस मुद्दे को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़कर देख रहा है और चाहता है कि अमेरिका किसी भी हाल में ग्रीनलैंड पर अपनी पकड़ मजबूत करे।
हालांकि, अमेरिकी सेना के वरिष्ठ अधिकारी इस योजना को लेकर असहज बताए जा रहे हैं। उनके सामने सबसे बड़ा सवाल इसकी कानूनी वैधता और राजनीतिक व्यवहारिकता को लेकर है। इसके बावजूद US invade Greenland की चर्चा अब सिर्फ बयानबाजी तक सीमित नहीं रह गई है।

ट्रंप क्यों दिखा रहे हैं ग्रीनलैंड में इतनी दिलचस्पी

ग्रीनलैंड, जो डेनमार्क के किंगडम का एक स्वायत्त क्षेत्र है, लंबे समय से अमेरिका की रणनीतिक नजर में रहा है। करीब 57 हजार की आबादी वाला यह इलाका भले ही छोटा दिखे, लेकिन इसका भू-राजनीतिक महत्व काफी बड़ा है। आर्कटिक क्षेत्र में मौजूद होने के कारण यहां से नए समुद्री व्यापार मार्ग खुल रहे हैं और दुर्लभ खनिजों की मौजूदगी भी इसे अहम बनाती है।
ट्रंप का मानना है कि अगर अमेरिका ने कदम नहीं उठाया, तो रूस या चीन ग्रीनलैंड में अपना प्रभाव बढ़ा सकते हैं। इसी तर्क को आधार बनाकर US invade Greenland की सोच सामने लाई जा रही है।

सेना से क्यों कहा गया प्लान तैयार करने को

रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप ने जॉइंट स्पेशल ऑपरेशंस कमांड (JSOC) को निर्देश दिया है कि वे ग्रीनलैंड पर सैन्य कार्रवाई का एक संभावित खाका तैयार रखें। इस प्रक्रिया में ट्रंप के करीबी राजनीतिक सलाहकार स्टीफन मिलर की भूमिका अहम बताई जा रही है।
हाल ही में वेनेजुएला में पूर्व राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी से जुड़े ऑपरेशन के बाद ट्रंप का आत्मविश्वास बढ़ा हुआ बताया जा रहा है। इसी पृष्ठभूमि में US invade Greenland की योजना पर विचार तेज हुआ है। हालांकि, पेंटागन के वरिष्ठ सैन्य अधिकारी इसे जल्दबाजी मान रहे हैं।

ट्रंप के बयान और बढ़ता विवाद

व्हाइट हाउस में तेल कंपनियों के अधिकारियों के साथ हुई एक बैठक में ट्रंप ने ग्रीनलैंड को लेकर खुलकर बात की। उन्होंने कहा, “हम ग्रीनलैंड पर कुछ करने जा रहे हैं, चाहे वे इसे पसंद करें या नहीं। अगर हमने नहीं किया, तो रूस या चीन वहां कब्जा कर लेगा।”
ट्रंप ने डेनमार्क की ऐतिहासिक दावेदारी को भी खारिज करते हुए कहा कि सिर्फ सदियों पहले किसी जहाज के वहां पहुंच जाने से मालिकाना हक नहीं बन जाता। इन बयानों के बाद US invade Greenland वैश्विक बहस का विषय बन गया।

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डेनमार्क और ग्रीनलैंड की प्रतिक्रिया

डेनमार्क ने ट्रंप के रुख पर कड़ी आपत्ति जताई है। डेनिश अधिकारियों का कहना है कि ग्रीनलैंड उनके संप्रभु क्षेत्र का हिस्सा है और किसी भी तरह की सैन्य कार्रवाई अस्वीकार्य होगी।
ग्रीनलैंड के स्थानीय नेताओं ने भी साफ कहा है कि वे न तो अमेरिका का हिस्सा बनना चाहते हैं और न ही किसी बाहरी दबाव को स्वीकार करेंगे। वहां की राजनीतिक पार्टियों और नागरिक संगठनों ने US invade Greenland की चर्चा के खिलाफ एकजुटता दिखाई है।

अमेरिका पहले से मौजूद है, फिर आक्रमण क्यों

एक अहम सवाल यह भी उठ रहा है कि जब अमेरिका पहले से ही ग्रीनलैंड में सैन्य मौजूदगी रखता है, तो फिर आक्रमण की जरूरत क्यों। 1951 के एक समझौते के तहत अमेरिका वहां थुले एयर बेस संचालित करता है, जो मिसाइल डिफेंस और आर्कटिक निगरानी के लिहाज से अहम है।
आलोचकों का कहना है कि US invade Greenland का विचार सैन्य से ज्यादा राजनीतिक संदेश देने की कोशिश है, जिससे ट्रंप अपने समर्थकों को मजबूत नेतृत्व का संकेत देना चाहते हैं।

सेना और कांग्रेस में असमंजस

रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी सेना के शीर्ष अधिकारी इस योजना को लेकर कांग्रेस की प्रतिक्रिया से भी चिंतित हैं। ग्रीनलैंड पर हमला न सिर्फ अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ माना जा सकता है, बल्कि यह NATO के भीतर भी गंभीर संकट पैदा कर सकता है, क्योंकि डेनमार्क NATO का सदस्य है।
ऐसे में US invade Greenland का मतलब होगा कि अमेरिका अपने ही गठबंधन के एक देश के खिलाफ कदम उठाए, जो अब तक की अमेरिकी विदेश नीति से अलग दिशा होगी।

NATO और वैश्विक असर

ट्रंप के बयानों के बाद यूरोपीय देशों में चिंता बढ़ गई है। ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस जैसे देशों ने संयम बरतने और बातचीत से समाधान निकालने की अपील की है। NATO के भीतर यह सवाल भी उठने लगा है कि अगर अमेरिका डेनमार्क के खिलाफ कार्रवाई करता है, तो गठबंधन की सामूहिक सुरक्षा नीति का क्या होगा।
रूस ने इस मुद्दे पर अमेरिका पर साम्राज्यवादी सोच का आरोप लगाया है, जबकि चीन ने फिलहाल चुप्पी साध रखी है, लेकिन आर्कटिक क्षेत्र में उसकी गतिविधियां पहले से बढ़ रही हैं। इन सबके बीच US invade Greenland वैश्विक राजनीति का संवेदनशील मुद्दा बन गया है।

ग्रीनलैंड इतना अहम क्यों

ग्रीनलैंड न सिर्फ दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है, बल्कि यहां दुर्लभ खनिजों का भंडार भी मौजूद है, जो इलेक्ट्रिक वाहनों और आधुनिक तकनीक के लिए जरूरी माने जाते हैं। इसके अलावा, आर्कटिक में बढ़ती गतिविधियों के चलते यह क्षेत्र सैन्य दृष्टि से भी अहम हो गया है।
ट्रंप का तर्क है कि अमेरिका को भविष्य की चुनौतियों के लिए अभी से तैयार रहना चाहिए, और इसी सोच के तहत US invade Greenland की बात सामने लाई जा रही है।

आगे क्या हो सकता है

फिलहाल यह साफ नहीं है कि ट्रंप प्रशासन वास्तव में सैन्य कार्रवाई की ओर बढ़ेगा या इसे सिर्फ दबाव बनाने की रणनीति के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो की डेनमार्क के नेताओं से बातचीत प्रस्तावित है, जिससे संकेत मिलता है कि कूटनीति का रास्ता अभी खुला है।
लेकिन अगर हालात बिगड़ते हैं, तो US invade Greenland केवल एक विचार नहीं, बल्कि एक बड़े अंतरराष्ट्रीय संकट की शुरुआत बन सकता है। आने वाले हफ्तों में यह साफ होगा कि अमेरिका इस मुद्दे पर संवाद को तरजीह देता है या टकराव की राह चुनता है। दुनिया की नजरें अब वॉशिंगटन और कोपेनहेगन पर टिकी हैं।

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