US Iran Conflict: अमेरिका और ईरान के रिश्तों में एक बार फिर तल्खी साफ दिखाई देने लगी है। बीते कुछ दिनों में जिस तरह के बयान सामने आए हैं, उन्होंने US Iran conflict को दोबारा सुर्खियों में ला दिया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से ईरान को दी गई कड़ी चेतावनी और उसके जवाब में तेहरान का सख्त रुख यह सवाल खड़ा कर रहा है कि क्या US Iran conflict सिर्फ जुबानी जंग तक सीमित रहेगा या आगे कोई बड़ा मोड़ आ सकता है।
सोमवार को फ्लोरिडा स्थित मार-ए-लागो में प्रेस से बात करते हुए ट्रंप ने कहा कि उन्हें ऐसी जानकारी मिली है कि ईरान अपनी सैन्य ताकत को दोबारा खड़ा करने की कोशिश कर रहा है। खास तौर पर बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम और कुछ न्यूक्लियर ठिकानों को लेकर उन्होंने चिंता जताई। ट्रंप का कहना था कि अगर ईरान ने ऐसा किया, तो अमेरिका की प्रतिक्रिया बेहद कड़ी होगी। उनके इस बयान ने US Iran conflict को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया।
जून के हमलों की पृष्ठभूमि
असल में मौजूदा US Iran conflict की जड़ें इसी साल जून में हुए घटनाक्रम से जुड़ी हैं। जून में अमेरिका ने ईरान के तीन अहम न्यूक्लियर ठिकानों—फोर्डो, नतांज और इस्फहान—पर हवाई हमले किए थे। ट्रंप ने तब दावा किया था कि इन हमलों से ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम गंभीर रूप से कमजोर हो गया है।
हालांकि ईरान ने हमेशा की तरह इन दावों को खारिज किया। तेहरान का कहना रहा कि उसका न्यूक्लियर कार्यक्रम शांतिपूर्ण है और वह परमाणु हथियार बनाने की दिशा में काम नहीं कर रहा। इसके बाद दोनों देशों के बीच कुछ दिन तक तनाव रहा, जवाबी कार्रवाई भी हुई, लेकिन हालात बड़े टकराव में बदलने से पहले ही सीजफायर हो गया। उस वक्त लगा था कि US Iran conflict फिलहाल ठंडा पड़ गया है, लेकिन अब हालिया बयान बता रहे हैं कि तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ।
ट्रंप की नई चेतावनी
ताजा बयान में ट्रंप ने साफ कहा कि अगर ईरान नई साइट्स पर काम कर रहा है या अपने हथियार कार्यक्रम को आगे बढ़ा रहा है, तो उसके गंभीर परिणाम होंगे। उन्होंने यह भी जोड़ा कि अमेरिका किसी भी तरह के सैन्य बिल्ड-अप को बर्दाश्त नहीं करेगा। इस बयान को कई विश्लेषक US Iran conflict में दबाव बनाने की रणनीति के तौर पर देख रहे हैं।
यह बयान उस समय आया, जब ट्रंप की मुलाकात बेंजामिन नेतन्याहू से हुई। इजरायल पहले से ही ईरान को अपने लिए बड़ा सुरक्षा खतरा मानता रहा है। ट्रंप ने संकेत दिए कि अगर ईरान ने मिसाइल क्षमता बढ़ाई, तो अमेरिका इजरायल के साथ खड़ा रहेगा। यह बात US Iran conflict को सिर्फ द्विपक्षीय मुद्दा नहीं रहने देती, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया की सुरक्षा से जोड़ देती है।
ईरान का पलटवार
ट्रंप की चेतावनी के कुछ ही घंटों बाद ईरान की ओर से तीखी प्रतिक्रिया आई। ईरान के सुप्रीम लीडर के सलाहकार अली शमखानी ने सोशल मीडिया पर लिखा कि ईरान की रक्षा नीति में कई जवाब पहले से तय होते हैं। उन्होंने कहा कि ईरान की मिसाइल और रक्षा क्षमताओं को कोई नहीं रोक सकता।
शमखानी ने साफ शब्दों में कहा कि किसी भी हमले का जवाब तुरंत और बेहद सख्त होगा। उनका यह बयान सीधे तौर पर US Iran conflict में शक्ति संतुलन दिखाने की कोशिश माना जा रहा है। ईरान का संदेश साफ था कि वह किसी दबाव में अपने सैन्य कार्यक्रम पर रोक लगाने वाला नहीं है।
बढ़ता क्षेत्रीय तनाव
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने भी हालात को गंभीर बताया है। उन्होंने कहा कि उनका देश अमेरिका, इजरायल और यूरोप के साथ लगातार दबाव और टकराव की स्थिति में है। ऐसे बयान यह संकेत देते हैं कि US Iran conflict सिर्फ अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर पूरे मिडिल ईस्ट पर पड़ सकता है।
पश्चिम एशिया पहले से ही कई मोर्चों पर अस्थिर है। जून के हमलों के बाद तेल की कीमतों में उछाल देखा गया था। अगर US Iran conflict फिर से तेज होता है, तो कच्चे तेल की आपूर्ति पर असर पड़ सकता है। ईरान के पास हिजबुल्लाह और हूती जैसे प्रॉक्सी समूह भी हैं, जो क्षेत्र में तनाव बढ़ा सकते हैं।
भारत और दुनिया की चिंता
भारत जैसे देशों के लिए US Iran conflict चिंता का विषय है। भारत ईरान से तेल आयात करता है और खाड़ी क्षेत्र में किसी भी अस्थिरता का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। तेल की कीमतें बढ़ने से महंगाई बढ़ने का खतरा रहता है।
संयुक्त राष्ट्र और अन्य वैश्विक ताकतें फिलहाल संयम की अपील कर रही हैं। रूस ने भी संकेत दिए हैं कि वह बातचीत के जरिए तनाव कम करने में भूमिका निभा सकता है। लेकिन ट्रंप का रुख सख्त दिख रहा है। वह बातचीत की बात तो कर रहे हैं, लेकिन शर्तों के साथ।
आगे क्या?
फिलहाल US Iran conflict बयानबाजी के स्तर पर है, लेकिन इतिहास बताता है कि ऐसे हालात कभी भी तेजी से बदल सकते हैं। जून में सीजफायर के बाद उम्मीद जगी थी कि हालात सुधरेंगे, मगर ताजा घटनाक्रम बता रहा है कि तनाव अब भी सतह के नीचे मौजूद है।
अब सवाल यही है कि क्या यह टकराव सिर्फ चेतावनियों और जवाबी बयानों तक सीमित रहेगा या US Iran conflict में कोई नया अध्याय जुड़ने वाला है। पश्चिम एशिया की नाजुक स्थिति को देखते हुए दुनिया की नजरें इस पर टिकी हैं। आने वाले हफ्ते तय करेंगे कि यह तनाव किस दिशा में जाता है।
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